बच्चों के बचपन को पढ़ाई के बोझ तले नष्ट ना होने दें।

बचपन ज़िन्दगी का एक ऐसा पड़ाव है, जहां चंचलता है, मस्ती है और कुछ सपने हैं। बचपन में चिंता, तनाव जैसी चीजों की कोई जगह नहीं है। लेकिन आजकल बच्चों में तनाव एक आम बात हो गई है। तनाव पढ़ाई का, अधिक से अधिक अंक लाने का। इसी का नतीजा है कि एक परीक्षा पास ना होने पर बचे आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं। लेकिन बच्चों में यह तनाव कहां से आ रहा है? इसके लिए जिम्मेवार कौन है?

हमने बच्चों को एक होड़ में लगा रखा है। अंक लाने की होड़, कक्षा में प्रथम आने की होड़। प्रतिस्पर्धा जरूरी है लेकिन इसी होड़ में बच्चों के मासूम कंधों पर फालतू का बोझ डालते जा रहे हैं। बच्चों की दिनचर्या इतनी व्यस्त कर दी है कि बच्चों का सारा वक्त सिर्फ पढ़ाई में ही निकल जाता है।

स्कूलों में निर्धारित पाठ्यक्रम के अलावा अतिरिक्त विषयों का बोझ बच्चों में बढ़ते तनाव का प्रमुख कारण है। भला पहली कक्षा के बच्चों को कंप्यूटर जैसे विषयों की किताब पढ़ने की क्या ज़रूरत है?
हम बच्चों में व्यावहारिक ज्ञान और तार्किक क्षमता को बढ़ाने की बजाय सिर्फ अंक लाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। जिसका सीधा असर बच्चों पर मानसिक तनाव के रूप में पड़ता है।

क्या अंक मानसिक क्षमता मापने का सबसे उपयुक्त तरीका है?

अभी हाल ही में परीक्षा परिणाम आने के बाद देश भर से कई छात्र- छात्राओं द्वारा आत्महत्या करने की खबरें मिली। इसके बाद छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अफसर ने अपने अंक सोशल मीडिया पर शेयर किए। दसवीं में लगभग 45 फीसदी, बारहवीं में 65 और स्नातक में 60 फीसदी अंक लेने के बाद भी आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण की। ऐसे कुछ उदाहरण और भी होंगे। वहीं लाखों उदाहरण ऐसे भी होंगे जो बोर्ड में 90-95 फीसदी अंक लेने के बावजूद एक साधारण सी नौकरी हासिल करने में नाकाम रहे हैं

निष्कर्ष यह है कि सिर्फ अंक ही योग्यता का सटीक मापदंड नहीं है। इसलिए ज़रूरत है कि हम एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करें जिसमें बच्चों को अंकों के लिए किताबी कीड़ा न बनाकर उनके सम्पूर्ण विकास की ओर ध्यान दिया जाए। पढ़ाई के साथ साथ बच्चों को खेलकूद तथा अन्य गतिविधियों के लिए भी पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए। खेलकूद सिर्फ बच्चों के सेहत के लिए ही फायदेमंद नहीं है बल्कि खेलों से बच्चों में अनुशासन, टीम वर्क, नेतृत्व क्षमता इत्यादि गुणों का विकास भी होता है जो जीवन में हरेक कदम पर काम आते हैं।

पढ़ाई व खेलकूद के अलावा सबसे अहम चीज है, आराम। बच्चों को पर्याप्त नींद और आराम के लिए समय मिलना बेहद जरूरी है। यदि हम अपने शरीर और दिमाग को पर्याप्त आराम देंगे तभी हमारा दिमाग सुचारू रूप से और बेहतर काम कर पाएगा।

इसलिए स्कूलों में अध्यापकों तथा घर में अभिभावकों को ध्यान देना चाहिए कि बच्चों की दिनचर्या में पढ़ाई के अलावा खेलकूद और आराम का संतुलन बना रहे।

हम छोटी उम्र से ही बच्चों को मानसिक तौर पर ऐसे तैयार करें जिससे की बचे भविष्य में आने वाली हरेक परिस्थिति का डटकर मुकाबला कर सके। पढ़ाई तो सालों साल चलती रहेगी और सीखना भी उम्र भर चलता रहेगा लेकिन बचपन सिर्फ एक बार आता है। इसलिए बच्चों को अपने बचपन का आनंद लेने दीजिए। पढ़ाई के बोझ तले इस बचपन को नष्ट ना कीजिए।